25 साल का जश्न या अधूरा हिसाब? टीम इंडिया की कामयाबी के पीछे छुपे सवाल

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यादगार सफर, लेकिन क्या तस्वीर पूरी है?

पिछले 25 सालों में भारतीय क्रिकेट ने जो ऊँचाइयाँ छुई हैं, उन पर सवाल उठाना आसान नहीं है। विदेशी ज़मीन पर जीत, आईसीसी ट्रॉफियाँ और तीनों फॉर्मेट में नंबर-1 बनने का तमगा—सब कुछ काग़ज़ पर बेहद शानदार दिखता है। लेकिन अगर ज़रा ठहरकर देखें, तो यह सफर जितना चमकदार दिखाया जाता है, उतना संतुलित शायद रहा नहीं। सवाल यह नहीं कि भारत सफल हुआ या नहीं, सवाल यह है कि क्या यह सफलता अपनी पूरी क्षमता के मुताबिक थी?

कप्तानी का बदलाव, सिस्टम वही

Sourav Ganguly से शुरू हुई आक्रामक सोच ने भारतीय टीम को आत्मविश्वास दिया, MS Dhoni ने उसे ट्रॉफियों में बदला, Virat Kohli ने फिटनेस और तेज़ क्रिकेट की संस्कृति बनाई और Rohit Sharma ने सफेद गेंद में स्थिरता दी। नाम बदले, चेहरे बदले, लेकिन सिस्टम की कुछ कमज़ोरियाँ जस की तस रहीं—खासकर बड़े मौकों पर दबाव झेलने की आदत।

टेस्ट में विदेश जीत, लेकिन निरंतरता कहां?

ऑस्ट्रेलिया में लगातार दो सीरीज़ जीत ऐतिहासिक थीं, इसमें कोई शक नहीं। लेकिन इंग्लैंड और न्यूज़ीलैंड जैसी परिस्थितियों में सीरीज़ जीत अब भी अपवाद ही रहीं। वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप के दो फाइनल खेलना उपलब्धि है, पर दोनों हारना यह भी बताता है कि निर्णायक मुकाबलों में भारत अब भी एक कदम पीछे रह जाता है। यह सवाल उठता है—क्या हमारी तैयारी लंबी दौड़ के लिए है या सिर्फ़ सीरीज़ जीतने तक सीमित?

वनडे का स्वर्णिम दौर, लेकिन विश्व कप का सूखा

वनडे में भारत का दबदबा सबसे ज़्यादा रहा, पर यही फॉर्मेट सबसे ज़्यादा निराशा भी देता है। 2011 के बाद 2023 तक विश्व कप का इंतज़ार खत्म नहीं हो पाया। फाइनल तक पहुँचना काबिल-ए-तारीफ़ है, मगर खिताब न जीत पाना इस बात की याद दिलाता है कि निरंतरता और मानसिक मज़बूती में अब भी फर्क है। क्या हम बड़े टूर्नामेंटों में रणनीति से ज़्यादा भावनाओं में बह जाते हैं?

टी20 में ट्रॉफी, पर ट्रांज़िशन की कीमत

2007 और 2024 की टी20 वर्ल्ड कप जीतें मील का पत्थर हैं। लेकिन इस फॉर्मेट में भी भारत ने कई बार सही समय पर सही बदलाव नहीं किए। युवा खिलाड़ियों को मौके मिले, पर कई बार बहुत देर से। सवाल यह है कि क्या भारत टी20 में ट्रेंड सेट करता है या बस ट्रेंड फॉलो करता है?

स्टार कल्चर बनाम टीम कल्चर

Sachin Tendulkar के 100 शतक हों या Jasprit Bumrah की मैच जिताऊ गेंदबाज़ी—भारत ने हमेशा स्टार पैदा किए। लेकिन कई मौकों पर टीम की ज़रूरतों से ज़्यादा व्यक्तिगत निर्भरता दिखी। जब स्टार नहीं चला, टीम भी लड़खड़ा गई। क्या यह संतुलन अब भी पूरी तरह सुधरा है?

25 साल बाद भी वही सवाल

छह आईसीसी ट्रॉफियाँ, घरेलू अजेय रिकॉर्ड और विदेशी जीत—यह सब मेहनत का नतीजा है, इसमें शक नहीं। लेकिन संसाधनों, प्रतिभा और गहराई को देखते हुए क्या यह आंकड़ा और बेहतर नहीं हो सकता था? 25 साल का सफर बताता है कि भारत ने बहुत कुछ हासिल किया, पर शायद उतना नहीं जितना वह कर सकता था।

निष्कर्ष: जश्न के साथ आत्ममंथन ज़रूरी

टीम इंडिया का यह 25 साल का दौर प्रेरणादायक है, लेकिन आत्मसंतोष खतरनाक भी। असली चुनौती अब ट्रॉफियों की गिनती नहीं, बल्कि बड़े मौकों पर अपनी कहानी खुद लिखने की है। अगर भारत अगले 25 सालों में सच में ‘राज’ करना चाहता है, तो उसे अपनी कमज़ोरियों को उतनी ही ईमानदारी से स्वीकार करना होगा, जितनी खुशी से वह अपनी जीतों का जश्न मनाता है।

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